即将过去的这周里,中美贸易关系波澜起伏。北京时间周二(7月30日)到周三(31日),美国贸易谈判代表团在上海与中方进行了近三个月来的首次公开对话,周五(8月2日)凌晨,美国总统特朗普突然通过推特表示,要从9月1日起向价值3000亿美元的中国商品加征10%关税。
这一转折来得有些突然。就在周三,美中双方都表示,这次磋商是“建设性的”,双方将于9月在华盛顿进行下一轮谈判。
双方上一次贸易对话要退回到5月初,当时中国副总理刘鹤率队前往美国,进行第11次中美贸易谈判。而由于特朗普在刘鹤赴美前夕突然宣布对中国商品加征关税,两国贸易对话随之中断。今年6月的G20大阪峰会上,特朗普与中国主席习近平一致同意,重启贸易谈判。
但从“推特治国”的特朗普这周发表的推文来看,这次的举动似乎有迹可循。特朗普本周每天都在推特上提及中国,且语气一直不善。就在本次对话开始前他还表示,中国的问题是“不会做到底”,而且总在最后关头将协议变得有利于中方。
那么在宣布加征关税前,特朗普对中国做出了哪些判断?我们整理了他本周与中国有关的9条推文,或许可以为你提供一些思路。
7月29日是中美贸易对话重启前一天,同时也是美联储7月议息会议前夕。一直要求美联储降息的特朗普表示,欧盟和中国会继续降息,让资金注入市场,为制造业销售产品提供便利,但与之相比,十年来一直加息的美联储“什么都没做”。
“我们的对手知道如何跟美国竞争,”他在推特上说。“这本来就是欧盟成立的初衷,而对于中国来说,美国一直被视作‘好欺负’。美联储的措施一直都是错误的。一次小幅度降息是不够的,但无论如何我们都会赢!”
与此同时,中国官媒新华社28日报道称,大阪“习特会”以来,中国企业已经采购数百万吨美国大豆,但美国农业部数据显示中国采购的美国大豆数量仅为100多万吨。对此中国外交部新闻司司长华春莹29日在例行记者会上表示,不了解中国购买美国农产品的情况,希望美方“采取具体措施落实好承诺,为双方经贸合作和磋商取得进展营造有利条件”。而大豆采购话题也成为接下来特朗普推特的目标。
北京时间7月30日下午,美国贸易代表团抵达上海,并出席中方准备的晚宴。差不多同一时间,特朗普在推特上再次瞄准中国。“中国现在情况很差,是27年来最差的一年,”特朗普发推称。“他们现在本应开始购买我们的农产品,但没有迹象表明他们正在做这件事”,“这就是中国的问题,他们不会做到底”。
“我的团队正在跟他们磋商,但他们总在最后把协议朝有利于自己的方向改变”,特朗普说。他还表示,中国寄希望于明年的美国大选选出一位民主党人后再签协议,但如果自己当选,最终的协议将会对中国更苛刻,甚至可能会没有协议。“所有的牌都在我们手上。”
一小时后,他再次发推称,中国已经损失了500万工作岗位,而“特朗普的关税”让中国丧失200万制造业的工作机会。“特朗普让中国坐立不安,而美国现在很好。”
Wednesday, August 7, 2019
Thursday, July 25, 2019
美国旧金山市长走访华埠商家 关注治安恶化问题
中国侨网7月25日电 据美国《世界日报》报道,美国旧金山市长布里德未出席中华总会馆22日举行的治安会议,改为23日与警局管理指挥层走访发生暴力事件的士德顿街,并宣传正在安装中的18部士德顿街的监视摄像头,她表示,相信这些摄像头将有助警方逮捕涉案者。
针对15日两位侨领黄中华及黄宏昶在华埠士德顿街及柏思域街路口被暴力打伤事件,中华总会馆22日举行治安会议。虽然当天数百名以华裔为主的人士挤满中华总会,要求市府加强保护生命安全受威胁的华裔及亚裔人士,但民选官员只见市议员佩斯金出席,警局高层也只有中央分局长易文耀到场。
但会议后第二天,布里德以走访士德顿街的方式,向华人社区回应她对治安问题的立场。当天陪同布里德走访士德顿街者包括非裔助理警察局长夏普林、华裔警指挥官邝友信、主管社区关系的警指挥官拉萨、其他警局指挥管理层者(Command Staff)、中央分局长易文耀等。
拉萨解释,警局高层没有出席前一天中华总会馆的会议,是警局内部的一项决定,并不表示警局不重视华人社区的意见。
布里德先在士德顿街与柏思域街路口案发现场出发走访商家居民,先与脸及头部被打伤的侨黄宏昶谈话。黄宏昶向布里德说,华埠治安恶化,他希望市府可加强华埠的警力,增加警员巡逻华埠,以保大家安全。
协助在士德顿街安装18台监视摄像头的“防止罪案资源中心”职员向布里德说明摄像头的安装地点及相关资料。该批摄像头将全部集中在士德顿街的两个半街段上,由隧道出口开始至华盛顿街。
布里德向在场的媒体说,摄像头可协助警局追缉涉案者,可阻吓罪案,她同意涉案者应接受应有的检控及惩罚。
但本报接到多名华埠商家及居民的意见,他们认为该批摄像头并不足够,无法阻止持续发生的暴力罪行。他们提出的理由包括,长久以来华埠的街道暴力案件最集中在介乎华盛顿街至百老汇街的一段士德顿街。计划中装置摄像头的两个半街段的士德顿街人流较少,罪案也较少,效用不大。
有商家居民说,如果歹徒知道华盛顿街至百老汇街的一段士德顿街没有摄像头,可能就集中在这些街段犯案。市府应该将整段士德顿街装置摄像头,不是只有两个半街段。
有商家说,装置监视摄像头的费用不太高,为何不能全面安装?质疑市府不断拨发大量经费处理游民问题,又要设立毒品注射中心,为何没有经费拨给华埠改善治安?是否市府不重视华人社区?
两年半前市议员佩斯金已为该18台摄像头取得45000美元经费,来自中央地铁计划。佩斯金办公室表示,当年该批摄像头主要是为美邻园及万华大夏的年长住客而设,保护他们的安全,因此设立摄像头的位置是由隧道口至华盛顿街。(李秀兰)
针对15日两位侨领黄中华及黄宏昶在华埠士德顿街及柏思域街路口被暴力打伤事件,中华总会馆22日举行治安会议。虽然当天数百名以华裔为主的人士挤满中华总会,要求市府加强保护生命安全受威胁的华裔及亚裔人士,但民选官员只见市议员佩斯金出席,警局高层也只有中央分局长易文耀到场。
但会议后第二天,布里德以走访士德顿街的方式,向华人社区回应她对治安问题的立场。当天陪同布里德走访士德顿街者包括非裔助理警察局长夏普林、华裔警指挥官邝友信、主管社区关系的警指挥官拉萨、其他警局指挥管理层者(Command Staff)、中央分局长易文耀等。
拉萨解释,警局高层没有出席前一天中华总会馆的会议,是警局内部的一项决定,并不表示警局不重视华人社区的意见。
布里德先在士德顿街与柏思域街路口案发现场出发走访商家居民,先与脸及头部被打伤的侨黄宏昶谈话。黄宏昶向布里德说,华埠治安恶化,他希望市府可加强华埠的警力,增加警员巡逻华埠,以保大家安全。
协助在士德顿街安装18台监视摄像头的“防止罪案资源中心”职员向布里德说明摄像头的安装地点及相关资料。该批摄像头将全部集中在士德顿街的两个半街段上,由隧道出口开始至华盛顿街。
布里德向在场的媒体说,摄像头可协助警局追缉涉案者,可阻吓罪案,她同意涉案者应接受应有的检控及惩罚。
但本报接到多名华埠商家及居民的意见,他们认为该批摄像头并不足够,无法阻止持续发生的暴力罪行。他们提出的理由包括,长久以来华埠的街道暴力案件最集中在介乎华盛顿街至百老汇街的一段士德顿街。计划中装置摄像头的两个半街段的士德顿街人流较少,罪案也较少,效用不大。
有商家居民说,如果歹徒知道华盛顿街至百老汇街的一段士德顿街没有摄像头,可能就集中在这些街段犯案。市府应该将整段士德顿街装置摄像头,不是只有两个半街段。
有商家说,装置监视摄像头的费用不太高,为何不能全面安装?质疑市府不断拨发大量经费处理游民问题,又要设立毒品注射中心,为何没有经费拨给华埠改善治安?是否市府不重视华人社区?
两年半前市议员佩斯金已为该18台摄像头取得45000美元经费,来自中央地铁计划。佩斯金办公室表示,当年该批摄像头主要是为美邻园及万华大夏的年长住客而设,保护他们的安全,因此设立摄像头的位置是由隧道口至华盛顿街。(李秀兰)
Friday, July 19, 2019
बिहारः छपरा में तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्याः दिन की बड़ी ख़बरें
बिहार के सारण (छपरा) ज़िले में गुरुवार की देर रात तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी. मृतकों की पहचान कर ली गयी है जिनके नाम नौशाद कुरैशी, राजू नट और विदेशी नट हैं.
यह घटना ज़िले के बनियापुर थाना अंतर्गत पिठौरी नंदलाल टोला गाँव में हुई. ग्रामीणों ने तीनों मृतकों पर मवेशी चोरी करने का आरोप लगाया है.
इस संबंध में छपरा के पुलिस अधीक्षक हरिकिशोर राय ने माबलिंचिंग की किसी घटना से इंकार किया और कहा, "तीनों मृतक गाँव में भैंस चोरी कर रहे थे. इसी दौरान घर वालों की नींद खुल गयी और तीनों को पकड़ कर उनके साथ मारपीट की गयी. इलाज के क्रम में तीनों की मौत हो गयी. मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया है. फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है."
उत्तर प्रदेश में सोनभद्र हत्याकांड के पीड़ितों से मिलने जा रहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को गिरफ़्तार किया गया है.
प्रियंका गांधी ने एएनआई से बातचीत में कहा, "गिरफ़्तार किया गया है. हमें कुछ भी कर लें, हम नहीं झुकेंगे. हम यहां शांतिपूर्वक पीड़ित परिवारों से मिलने आए हैं."
सोनभद्र में 10 लोगों की हत्या के बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी पीड़ित परिवारों से मिलने जा रही थीं.
इस मामले में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे नेताओं के नाम हैं.
जस्टिस जस्टिस रोहिंटन फाली नरीमन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की डिविजन बेंच ने साथ ही सितंबर में रिटायर हो रहे जज का कार्यकाल बढ़ाने का निर्देश भी दिया है.
इस मामले की सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के सीबीआई जज एसके यादव 30 सितंबर 2019 को रिटायर हो रहे हैं.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दे कर कहा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता होगी.
बेंगलुरू के लेडी कर्ज़न रोड पर स्थित मंसूर ख़ान के आईएमए गोल्ड में सैकड़ों लोगों ने निवेश किये हैं और यह दफ़्तर जून में रमज़ान के बाद से बंद है.
उनकी कंपनी बुनियादी ढांचा, गोल्ड, फ़िक्स डिपॉज़िट, रियल इस्टेट, फ़ार्मास्युटिकल्स आदि में अपने पैसे लगाती थी.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई को एसआईटी प्रमुख रविकांत गौड़ा ने बताया कि आईएमए के संस्थापक-मालिक मोहम्मद मंसूर ख़ान को दुबई से भारत वापस आने और ख़ुद को क़ानून के सामने पेश करने के लिए राज़ी किया गया. इसके बाद उन्हें दुबई से दिल्ली लाया गया है और पूछताछ चल रही है.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई के अनुसार, मंसूर ख़ान को गिरफ़्तार करने के बाद ईडी उनसे एमटीएनएल बिल्डिंग में स्थित अपने दफ़्तर में पूछताछ के लिए ले गयी है.
मायावती ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये कहा, "बीजेपी को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. अगर वे सोचते हैं कि वे बहुत ईमानदार हैं तो इसकी जांच होनी चाहिए कि राजनीति में आने से पहले उनके (बीजेपी नेताओं) परिवार की संपत्ति कितनी थी और वह संपत्ति अब कितनी है? ताकि देश के सामने सबकुछ साफ़ हो सके."
मायावती ने कहा, "मैं पूछना चाहती हूं कि जब से बीजेपी सत्ता में आई है तब से पूरे देश में अरबों रुपये की संपत्ति पार्टी दफ़्तर के लिए ख़रीदी है. यह पैसे कहां से आये. क्या यह बेनामी संपत्ति नहीं है. इसका भी खुलासा होना चाहिए."
मायावती ने कहा, "बीजेपी, आरएसएस जातिवादी हैं. वे शिक्षा, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों में दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों का विकास नहीं देखना चाहते हैं. वे इसके लिए विभिन्न तरीकों से समस्या पैदा कर रहे हैं लेकिन हमारी पार्टी इन लोगों के विकास का काम कर रही है."
उन्होंने कहा, "दलित, आदिवासी आदि को इनसे घबराना नहीं चाहिए. अगर किसी के साथ भी ज़्यादती होगी तो हमारी पार्टी पीछे नहीं हटेगी और इंसाफ़ दिलाएगी."
इससे पहले मायावती ने ट्वीट कर लिखा था, "बीजेपी केन्द्र की सत्ता का अभी भी दुरुपयोग कर अपने विपक्षियों को षड्यंत्र के तहत जबरन फर्जी मामलों में फंसाकर उन्हें प्रताड़ित कर रही है. इसी क्रम में अब मेरे भाई-बहनों आदि को भी जबरदस्ती परेशान किया जा रहा है, जो अति-निन्दनीय है. लेकिन इससे बीएसपी डरने व झुकने वाली नहीं है."
उन्होंने लिखा, "ऐसी ही घिनौनी हरकत इसी पार्टी की सरकार ने 2003 में भी आयकर और सीबीआई आदि के जरिए हमारे विरूद्ध की थी, जो सर्वविदित है, जिसमें फिर हमें अन्त में काफ़ी संघर्ष के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट में न्याय मिला."
यह घटना ज़िले के बनियापुर थाना अंतर्गत पिठौरी नंदलाल टोला गाँव में हुई. ग्रामीणों ने तीनों मृतकों पर मवेशी चोरी करने का आरोप लगाया है.
इस संबंध में छपरा के पुलिस अधीक्षक हरिकिशोर राय ने माबलिंचिंग की किसी घटना से इंकार किया और कहा, "तीनों मृतक गाँव में भैंस चोरी कर रहे थे. इसी दौरान घर वालों की नींद खुल गयी और तीनों को पकड़ कर उनके साथ मारपीट की गयी. इलाज के क्रम में तीनों की मौत हो गयी. मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया है. फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है."
उत्तर प्रदेश में सोनभद्र हत्याकांड के पीड़ितों से मिलने जा रहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को गिरफ़्तार किया गया है.
प्रियंका गांधी ने एएनआई से बातचीत में कहा, "गिरफ़्तार किया गया है. हमें कुछ भी कर लें, हम नहीं झुकेंगे. हम यहां शांतिपूर्वक पीड़ित परिवारों से मिलने आए हैं."
सोनभद्र में 10 लोगों की हत्या के बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी पीड़ित परिवारों से मिलने जा रही थीं.
इस मामले में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे नेताओं के नाम हैं.
जस्टिस जस्टिस रोहिंटन फाली नरीमन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की डिविजन बेंच ने साथ ही सितंबर में रिटायर हो रहे जज का कार्यकाल बढ़ाने का निर्देश भी दिया है.
इस मामले की सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के सीबीआई जज एसके यादव 30 सितंबर 2019 को रिटायर हो रहे हैं.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दे कर कहा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता होगी.
बेंगलुरू के लेडी कर्ज़न रोड पर स्थित मंसूर ख़ान के आईएमए गोल्ड में सैकड़ों लोगों ने निवेश किये हैं और यह दफ़्तर जून में रमज़ान के बाद से बंद है.
उनकी कंपनी बुनियादी ढांचा, गोल्ड, फ़िक्स डिपॉज़िट, रियल इस्टेट, फ़ार्मास्युटिकल्स आदि में अपने पैसे लगाती थी.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई को एसआईटी प्रमुख रविकांत गौड़ा ने बताया कि आईएमए के संस्थापक-मालिक मोहम्मद मंसूर ख़ान को दुबई से भारत वापस आने और ख़ुद को क़ानून के सामने पेश करने के लिए राज़ी किया गया. इसके बाद उन्हें दुबई से दिल्ली लाया गया है और पूछताछ चल रही है.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई के अनुसार, मंसूर ख़ान को गिरफ़्तार करने के बाद ईडी उनसे एमटीएनएल बिल्डिंग में स्थित अपने दफ़्तर में पूछताछ के लिए ले गयी है.
मायावती ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये कहा, "बीजेपी को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. अगर वे सोचते हैं कि वे बहुत ईमानदार हैं तो इसकी जांच होनी चाहिए कि राजनीति में आने से पहले उनके (बीजेपी नेताओं) परिवार की संपत्ति कितनी थी और वह संपत्ति अब कितनी है? ताकि देश के सामने सबकुछ साफ़ हो सके."
मायावती ने कहा, "मैं पूछना चाहती हूं कि जब से बीजेपी सत्ता में आई है तब से पूरे देश में अरबों रुपये की संपत्ति पार्टी दफ़्तर के लिए ख़रीदी है. यह पैसे कहां से आये. क्या यह बेनामी संपत्ति नहीं है. इसका भी खुलासा होना चाहिए."
मायावती ने कहा, "बीजेपी, आरएसएस जातिवादी हैं. वे शिक्षा, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों में दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों का विकास नहीं देखना चाहते हैं. वे इसके लिए विभिन्न तरीकों से समस्या पैदा कर रहे हैं लेकिन हमारी पार्टी इन लोगों के विकास का काम कर रही है."
उन्होंने कहा, "दलित, आदिवासी आदि को इनसे घबराना नहीं चाहिए. अगर किसी के साथ भी ज़्यादती होगी तो हमारी पार्टी पीछे नहीं हटेगी और इंसाफ़ दिलाएगी."
इससे पहले मायावती ने ट्वीट कर लिखा था, "बीजेपी केन्द्र की सत्ता का अभी भी दुरुपयोग कर अपने विपक्षियों को षड्यंत्र के तहत जबरन फर्जी मामलों में फंसाकर उन्हें प्रताड़ित कर रही है. इसी क्रम में अब मेरे भाई-बहनों आदि को भी जबरदस्ती परेशान किया जा रहा है, जो अति-निन्दनीय है. लेकिन इससे बीएसपी डरने व झुकने वाली नहीं है."
उन्होंने लिखा, "ऐसी ही घिनौनी हरकत इसी पार्टी की सरकार ने 2003 में भी आयकर और सीबीआई आदि के जरिए हमारे विरूद्ध की थी, जो सर्वविदित है, जिसमें फिर हमें अन्त में काफ़ी संघर्ष के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट में न्याय मिला."
Monday, July 1, 2019
美国大选:“中国威胁论”何以成为候选人共识
什么是美国目前面临的头号威胁?在首晚辩论中,台上10名参选人有4人指认中国,包括众议员瑞恩(Tim Ryan)、前住房与城市发展部部长卡斯洛(Julian Castro)、参议员克洛布彻(Amy Klobuchar)、前众议员迪兰尼(John Delaney)。
对长期观察美国竞选政治的人士来说,这样的说辞并不陌生。迪兰尼此前接受BBC中文采访时表示,“中国的偷盗行为像海盗一样。”
第二晚辩论中,美国应如何迎接中国挑战的问题,被抛向了三名参选人。
“我们要认识到,中国带来的挑战很严峻。不是摇摇手能打发掉的。中国正利用科技来完善独裁统治,”党内新星布蒂吉格(Pete Buttigieg)说。
参议员贝内特(Michael Bennet)形容中国的贸易政策为“重商主义”。华裔企业家杨安泽(Andrew Yang)则说,要打击中国在贸易中的“不当行为”。
值得留意的是,三人都表示,对华征收关税是错误的策略。布蒂吉格主张投资国内,提高美国的科技竞争力,贝内特主张联合盟友向中国施压。
早前接受BBC中文采访时,杨安泽表示中美贸易战“不对任何人有好处”,损害两国工人和企业的利益。在辩论台上杨安泽说,他若担任总统,上台后首要修复对华关系,在气候变化、人工智能、朝鲜半岛问题上携手合作。
贸易战反对派占民主党总统参选人中的多数,但不容忽视的是,民调领先的进步派参议员桑德斯(Bernie Sanders)与沃伦(Elizabeth Warren)极力支持对华关税,桑德斯甚至呼吁将中国列为汇率操纵国。
参选人在竞选时主张对华强硬,上任之后政策趋于温和,转而寻求对华合作,是美国大选反复上演的戏码,尤其是在近二十年间。
智库清华—卡内基全球政策中心主任韩磊(Paul Haenle)曾撰文指出,总统参选人在对华问题上显得强势,是为了展示对于改善就业、贸易和制造业等与普通美国人生活息息相关的民生问题的决心。
韩磊警告,美国利用中国作为替罪羊长期影响中美互信。同时,他呼吁要区别看待竞选辞令与实际政策,中国观众在观看大选辩论时应理解竞选辞令针对的是美国选民,并不意味着会成为美国未来的政策。
克林顿竞选时批评在任的老布什“娇惯独裁者”,然而他担任总统时给予中国最惠国待遇,并将经济与人权问题脱钩。
小布什竞选时讥讽克林顿竞选言辞与实际对华政策大相径庭,他当时称中国为“竞争者”,但上台后转而描述对华关系为“坦诚、建设性和合作性的”,且亲自出席了北京奥运开幕式。
轮到奥巴马竞选时,他抨击小布什在对华政策上是个懦夫(patsy)。奥巴马当时直言不讳地称中国为汇率操纵国,但担任总统后改变了立场。
2012年,当共和党人罗姆尼(Mitt Romney)对阵竞选连任的奥巴马时,前者形容后者对北京“近乎乞求”。
罗姆尼当时承诺,要与中国打一场贸易战,在入主白宫的第一天,他就会宣布中国为货币操纵国,这意味着对中国货品施加惩罚性关税。他警告,美中贸易逆差过大,他的政府将向中国施压,要求他们不再盗窃知识产权、为国有企业提供补贴。
听起来很熟悉?大部分正是特朗普政府现行的政策,以及在贸易谈判中要求中方作出的结构性改革。
多年来高呼“中国强奸美国经济”的特朗普,上台两年来依然咬紧中国。美中贸易战延烧多时,面临2020年大选的特朗普,会见好就收匆匆宣告胜利,还是继续以对华强硬为他的核心竞选纲领?答案将在接下来几个月揭晓。
特朗普一定程度上践行竞选承诺,通过关税打击中国贸易,打破了美国选举“中国威胁论”雷声大雨点小的历史规律。
这给民主党人出了一个难题。如何在对华政策上与特朗普作出区隔,又迎合选民对改善国内民生问题的渴望?当特朗普将“美国至上”的牌打到极致,民主党人在外交政策上还有何表述空间?
许多总统参选人如今提倡国际合作,与特朗普“离间盟友”的政策作出区隔。
然而,“美国进步中心”在五月的一项民意调查发现,选民对“打击专制独裁政权”、“发扬民主”、“联合盟友和国际社会”这样的传统外交表述兴趣缺缺。
智库布鲁金斯学会主任怀特(Tom Wright)撰文建议,民主党人要打败特朗普,必须把中国放在外交政策的核心,而且要利用中国议题,将美国国内和外交政策联系起来,向选民展现关系到美国人日常生活的未来愿景。
“特朗普在政治上的阿克琉斯之踵,不是他的好斗或无知,而是他将焦点放在过去,而非未来,”怀特指出,美国选民认为中国是头号竞争对手,并非出于追求冲突,而是担心美国竞争力落后。
上述调查显示,68%的美国选民认为美国应增加国内投资来保持国际竞争力,而不仅仅是提高军费预算。
怀特指出,特朗普的对华政策充满对抗性,但缺乏竞争力。当特朗普热衷于谈论50年代工业产品钢铁、铝材、洗碗机、汽车,民主党人需要放眼5G、人工智能、绿色能源等未来产业。
按往届美国大选“中国威胁论”的教科书照本宣科已行不通,笼统无力的“联合盟友论”打发不了选民。面对中国挑战,民主党人亟需面向未来的全新论述。
对长期观察美国竞选政治的人士来说,这样的说辞并不陌生。迪兰尼此前接受BBC中文采访时表示,“中国的偷盗行为像海盗一样。”
第二晚辩论中,美国应如何迎接中国挑战的问题,被抛向了三名参选人。
“我们要认识到,中国带来的挑战很严峻。不是摇摇手能打发掉的。中国正利用科技来完善独裁统治,”党内新星布蒂吉格(Pete Buttigieg)说。
参议员贝内特(Michael Bennet)形容中国的贸易政策为“重商主义”。华裔企业家杨安泽(Andrew Yang)则说,要打击中国在贸易中的“不当行为”。
值得留意的是,三人都表示,对华征收关税是错误的策略。布蒂吉格主张投资国内,提高美国的科技竞争力,贝内特主张联合盟友向中国施压。
早前接受BBC中文采访时,杨安泽表示中美贸易战“不对任何人有好处”,损害两国工人和企业的利益。在辩论台上杨安泽说,他若担任总统,上台后首要修复对华关系,在气候变化、人工智能、朝鲜半岛问题上携手合作。
贸易战反对派占民主党总统参选人中的多数,但不容忽视的是,民调领先的进步派参议员桑德斯(Bernie Sanders)与沃伦(Elizabeth Warren)极力支持对华关税,桑德斯甚至呼吁将中国列为汇率操纵国。
参选人在竞选时主张对华强硬,上任之后政策趋于温和,转而寻求对华合作,是美国大选反复上演的戏码,尤其是在近二十年间。
智库清华—卡内基全球政策中心主任韩磊(Paul Haenle)曾撰文指出,总统参选人在对华问题上显得强势,是为了展示对于改善就业、贸易和制造业等与普通美国人生活息息相关的民生问题的决心。
韩磊警告,美国利用中国作为替罪羊长期影响中美互信。同时,他呼吁要区别看待竞选辞令与实际政策,中国观众在观看大选辩论时应理解竞选辞令针对的是美国选民,并不意味着会成为美国未来的政策。
克林顿竞选时批评在任的老布什“娇惯独裁者”,然而他担任总统时给予中国最惠国待遇,并将经济与人权问题脱钩。
小布什竞选时讥讽克林顿竞选言辞与实际对华政策大相径庭,他当时称中国为“竞争者”,但上台后转而描述对华关系为“坦诚、建设性和合作性的”,且亲自出席了北京奥运开幕式。
轮到奥巴马竞选时,他抨击小布什在对华政策上是个懦夫(patsy)。奥巴马当时直言不讳地称中国为汇率操纵国,但担任总统后改变了立场。
2012年,当共和党人罗姆尼(Mitt Romney)对阵竞选连任的奥巴马时,前者形容后者对北京“近乎乞求”。
罗姆尼当时承诺,要与中国打一场贸易战,在入主白宫的第一天,他就会宣布中国为货币操纵国,这意味着对中国货品施加惩罚性关税。他警告,美中贸易逆差过大,他的政府将向中国施压,要求他们不再盗窃知识产权、为国有企业提供补贴。
听起来很熟悉?大部分正是特朗普政府现行的政策,以及在贸易谈判中要求中方作出的结构性改革。
多年来高呼“中国强奸美国经济”的特朗普,上台两年来依然咬紧中国。美中贸易战延烧多时,面临2020年大选的特朗普,会见好就收匆匆宣告胜利,还是继续以对华强硬为他的核心竞选纲领?答案将在接下来几个月揭晓。
特朗普一定程度上践行竞选承诺,通过关税打击中国贸易,打破了美国选举“中国威胁论”雷声大雨点小的历史规律。
这给民主党人出了一个难题。如何在对华政策上与特朗普作出区隔,又迎合选民对改善国内民生问题的渴望?当特朗普将“美国至上”的牌打到极致,民主党人在外交政策上还有何表述空间?
许多总统参选人如今提倡国际合作,与特朗普“离间盟友”的政策作出区隔。
然而,“美国进步中心”在五月的一项民意调查发现,选民对“打击专制独裁政权”、“发扬民主”、“联合盟友和国际社会”这样的传统外交表述兴趣缺缺。
智库布鲁金斯学会主任怀特(Tom Wright)撰文建议,民主党人要打败特朗普,必须把中国放在外交政策的核心,而且要利用中国议题,将美国国内和外交政策联系起来,向选民展现关系到美国人日常生活的未来愿景。
“特朗普在政治上的阿克琉斯之踵,不是他的好斗或无知,而是他将焦点放在过去,而非未来,”怀特指出,美国选民认为中国是头号竞争对手,并非出于追求冲突,而是担心美国竞争力落后。
上述调查显示,68%的美国选民认为美国应增加国内投资来保持国际竞争力,而不仅仅是提高军费预算。
怀特指出,特朗普的对华政策充满对抗性,但缺乏竞争力。当特朗普热衷于谈论50年代工业产品钢铁、铝材、洗碗机、汽车,民主党人需要放眼5G、人工智能、绿色能源等未来产业。
按往届美国大选“中国威胁论”的教科书照本宣科已行不通,笼统无力的“联合盟友论”打发不了选民。面对中国挑战,民主党人亟需面向未来的全新论述。
Wednesday, June 19, 2019
蔡英文正式获得民进党提名 参加2020台湾“大选”
海外网6月19日电 民进党19日召开中执会,正式公告提名蔡英文参加2020年台湾地区领导人选举,蔡英文也赴民进党中央党部发表讲话,宣称“一定当选”。
据“东森新闻云”报道,本月13日,民进党2020初选民调公布,结果显示,台湾地区领导人蔡英文在民调中以35.67%比27.48%打败前“行政院长”赖清德,将代表民进党参与2020年台湾地区领导人选举。
民进党秘书长罗文嘉18日表示,预计7月底完成区域“立委”提名、8月底完成不分区名单,9月召开“全代会”。
民进党这次初选中,蔡英文与赖清德杀得刀刀见骨,有岛内团体称,蔡英文派系偷换初选规则,“民调作弊”,“民进党宛如贼窝”,台北市长柯文哲则说赖清德“好可怜哦,被做掉”。18日,蔡英文对民进党“立委”说,很多人说初选改变了她很多,她也承认,没有承受过这么重的压力。
蔡英文18日还与党内人士谈到国民党热门人选韩国瑜及郭台铭,称韩国瑜的语言能力很厉害,是很强的对手。至于鸿海集团董事长郭台铭,则是“财力雄厚”,在媒体跟文宣上,经营有很大不同。此外,在谈到台北市长柯文哲时,蔡英文仅说,“他会不会选目前都还不能确定”。
而国民党于10日公布党内初选名单,其中包括高雄市长韩国瑜、鸿海集团董事长郭台铭、前台北县长周锡玮、前新北市长朱立伦、台湾“孙文学校”总校长张亚中5人。随后将于7月5日到15日办理民调,16日宣布民调结果,28号提报全代会通过提名人选。
今年5月,郭台铭在出席活动时曾说,不管是韩国瑜还是他自己的支持者,目标都是一致的,就是2020把蔡英文当局拉下台。“蔡英文做衰台湾,她如果连任将是台湾人的不幸。”韩国瑜也曾痛批蔡英文贪恋权力,称她不想着帮2300万台湾同胞思考未来的发展之路。(海外网/杨佳)
中新社首尔6月19日电 (记者 曾鼐)韩国统一部19日称,决定通过国际组织向朝鲜提供5万吨大米。
当天,统一部向媒体发布新闻简报透露如上消息。统一部称,韩国政府在与世界粮食计划署磋商后,决定向朝鲜提供5万吨大米。
统一部表示,将通过世界粮食计划署向朝方提供粮食援助,具体时间和规模将在未来公布。
今年6月,韩国宣布,通过国际组织向朝鲜提供800万美元规模的人道主义援助。韩国此前多次表态称,对朝人道主义援助与朝鲜半岛安全局势无关。(完)
据“东森新闻云”报道,本月13日,民进党2020初选民调公布,结果显示,台湾地区领导人蔡英文在民调中以35.67%比27.48%打败前“行政院长”赖清德,将代表民进党参与2020年台湾地区领导人选举。
民进党秘书长罗文嘉18日表示,预计7月底完成区域“立委”提名、8月底完成不分区名单,9月召开“全代会”。
民进党这次初选中,蔡英文与赖清德杀得刀刀见骨,有岛内团体称,蔡英文派系偷换初选规则,“民调作弊”,“民进党宛如贼窝”,台北市长柯文哲则说赖清德“好可怜哦,被做掉”。18日,蔡英文对民进党“立委”说,很多人说初选改变了她很多,她也承认,没有承受过这么重的压力。
蔡英文18日还与党内人士谈到国民党热门人选韩国瑜及郭台铭,称韩国瑜的语言能力很厉害,是很强的对手。至于鸿海集团董事长郭台铭,则是“财力雄厚”,在媒体跟文宣上,经营有很大不同。此外,在谈到台北市长柯文哲时,蔡英文仅说,“他会不会选目前都还不能确定”。
而国民党于10日公布党内初选名单,其中包括高雄市长韩国瑜、鸿海集团董事长郭台铭、前台北县长周锡玮、前新北市长朱立伦、台湾“孙文学校”总校长张亚中5人。随后将于7月5日到15日办理民调,16日宣布民调结果,28号提报全代会通过提名人选。
今年5月,郭台铭在出席活动时曾说,不管是韩国瑜还是他自己的支持者,目标都是一致的,就是2020把蔡英文当局拉下台。“蔡英文做衰台湾,她如果连任将是台湾人的不幸。”韩国瑜也曾痛批蔡英文贪恋权力,称她不想着帮2300万台湾同胞思考未来的发展之路。(海外网/杨佳)
中新社首尔6月19日电 (记者 曾鼐)韩国统一部19日称,决定通过国际组织向朝鲜提供5万吨大米。
当天,统一部向媒体发布新闻简报透露如上消息。统一部称,韩国政府在与世界粮食计划署磋商后,决定向朝鲜提供5万吨大米。
统一部表示,将通过世界粮食计划署向朝方提供粮食援助,具体时间和规模将在未来公布。
今年6月,韩国宣布,通过国际组织向朝鲜提供800万美元规模的人道主义援助。韩国此前多次表态称,对朝人道主义援助与朝鲜半岛安全局势无关。(完)
Monday, May 27, 2019
मोदी राज में विपक्ष के अस्तित्व का संकट, सरकार पर कौन लगाएगा अंकुश?
लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई है. भाजपा ने अकेले तीन सौ के आंकड़ों को पार किया और 303 सीटों पर जीत का परचम लहराने में सफल रही.
अन्य सहयोगी पार्टियों के साथ ने इस जीत को और प्रचंड बना दिया. एनडीए ने लोकसभा की कुल 353 सीटों पर कब्जा किया, वहीं कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए 92 सीटों पर सिमट कर रह गया.
कांग्रेस के अकेले प्रदर्शन की बात करें तो काफी खींच-तान के बाद पार्टी को महज 52 सीटों पर सफलता मिली.
भाजपा की इस बड़ी जीत के बाद भारतीय राजनीति में विपक्ष के सामने एक बार फिर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
सत्रहवीं लोकसभा में सरकार के सामने आधिकारिक रूप से विपक्ष का नेता नहीं होगा. पिछली सरकार में भी ऐसी ही स्थिति थी.
सदन में सरकार के सामने कई विपक्षी पार्टियां होती हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर उस पार्टी को विपक्ष का नेता बनाने का मौका मिलता है जिसके पास कम से कम 10 फीसदी सीटें हासिल हों.
यानी 543 सीटों वाले लोकसभा में विपक्ष का नेता उस पार्टी का होगा, जिसके पास कम से कम 55 सीट होंगी.
इस बार कांग्रेस इस आंकड़े को छू पाने में सफल नहीं रही है. पार्टी के पास 52 सांसद हैं और विपक्षी नेता का तमग़ा हासिल करने से वो तीन पायदान नीचे रह गई.
2014 के चुनावों की बात करें तो कांग्रेस महज 44 सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी और उस बार भी सदन को विपक्ष का नेता नहीं मिल पाया था.
मोदी राज में न सिर्फ विपक्षी पार्टियों बल्कि विपक्ष के नेता के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. अब सवाल उठता है कि ऐसे में भारतीय लोकतंत्र किस ओर जाएगा?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि हमारी संसदीय राजनीति में विपक्ष के नेता की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका संविधान के अनुसार लोकतंत्र को चलाने के लिए होती है.
नवीन जोशी कहते हैं, "संवैधानिक संस्थानों जैसे सीबीआई का निदेशक या सूचना आयुक्त की नियुक्ति या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिपक्ष के नेता की बड़ी भूमिका होती है."
"विपक्ष के नेता का ओहदा प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के स्तर का समझा जाता है. पिछली बार भी कांग्रेस इतनी सीटें नहीं ला पाई थी कि तकनीक तौर पर विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल कर पाती, इस बार भी वो यह दर्जा पाने में नाकाम रही है."
"ऐसे में फर्क तो पड़ता है. जो आवाज़ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की हो सकती है, वो कृपा या सरकार की उदारता के कारण मिले दर्जे की नहीं हो सकती है."
एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का होना ज़रूरी समझा जाता है. विपक्ष सरकार के कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे निरंकुश होने से रोकता है.
संसद में अगर विपक्ष कमज़ोर होता है तो मनमाने तरीके से सत्ता पक्ष कानून बना सकता है और सदन में किसी मुद्दे पर अच्छी बहस मज़बूत विपक्ष के बिना संभव नहीं है.
भारतीय लोकतंत्र इस बात का गवाह रहा है कि जब भी अटल बिहारी वाजपेयी, भैरो सिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता संसद में बोलते थे, सत्ता पक्ष उनकी बातों को संजीदगी से सुनता था.
न सिर्फ सुनना, नीतियों और योजनाओं को विपक्ष की बहस से धार दिया जाता था और उसे जनोत्थान के लिए बेहतर समझा जाता है.
एनडीए सरकार भी मज़बूत विपक्ष के महत्व को समझती है. भाजपा के वरिष्ठ नेता तरुण विजय क्षेत्रीय अख़बार प्रभात ख़बर में प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं, "विपक्ष धारदार, असरदार और ईमानदार हो तो सरकार उसके डर से कांपती है, देश का भला होता है, सरकारी नेताओं का अंहकार, उनकी निरंकुश और मनमानी नियंत्रित रहती है."
अन्य सहयोगी पार्टियों के साथ ने इस जीत को और प्रचंड बना दिया. एनडीए ने लोकसभा की कुल 353 सीटों पर कब्जा किया, वहीं कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए 92 सीटों पर सिमट कर रह गया.
कांग्रेस के अकेले प्रदर्शन की बात करें तो काफी खींच-तान के बाद पार्टी को महज 52 सीटों पर सफलता मिली.
भाजपा की इस बड़ी जीत के बाद भारतीय राजनीति में विपक्ष के सामने एक बार फिर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
सत्रहवीं लोकसभा में सरकार के सामने आधिकारिक रूप से विपक्ष का नेता नहीं होगा. पिछली सरकार में भी ऐसी ही स्थिति थी.
सदन में सरकार के सामने कई विपक्षी पार्टियां होती हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर उस पार्टी को विपक्ष का नेता बनाने का मौका मिलता है जिसके पास कम से कम 10 फीसदी सीटें हासिल हों.
यानी 543 सीटों वाले लोकसभा में विपक्ष का नेता उस पार्टी का होगा, जिसके पास कम से कम 55 सीट होंगी.
इस बार कांग्रेस इस आंकड़े को छू पाने में सफल नहीं रही है. पार्टी के पास 52 सांसद हैं और विपक्षी नेता का तमग़ा हासिल करने से वो तीन पायदान नीचे रह गई.
2014 के चुनावों की बात करें तो कांग्रेस महज 44 सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी और उस बार भी सदन को विपक्ष का नेता नहीं मिल पाया था.
मोदी राज में न सिर्फ विपक्षी पार्टियों बल्कि विपक्ष के नेता के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. अब सवाल उठता है कि ऐसे में भारतीय लोकतंत्र किस ओर जाएगा?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि हमारी संसदीय राजनीति में विपक्ष के नेता की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका संविधान के अनुसार लोकतंत्र को चलाने के लिए होती है.
नवीन जोशी कहते हैं, "संवैधानिक संस्थानों जैसे सीबीआई का निदेशक या सूचना आयुक्त की नियुक्ति या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिपक्ष के नेता की बड़ी भूमिका होती है."
"विपक्ष के नेता का ओहदा प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के स्तर का समझा जाता है. पिछली बार भी कांग्रेस इतनी सीटें नहीं ला पाई थी कि तकनीक तौर पर विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल कर पाती, इस बार भी वो यह दर्जा पाने में नाकाम रही है."
"ऐसे में फर्क तो पड़ता है. जो आवाज़ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की हो सकती है, वो कृपा या सरकार की उदारता के कारण मिले दर्जे की नहीं हो सकती है."
एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक मज़बूत सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का होना ज़रूरी समझा जाता है. विपक्ष सरकार के कार्यों और नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे निरंकुश होने से रोकता है.
संसद में अगर विपक्ष कमज़ोर होता है तो मनमाने तरीके से सत्ता पक्ष कानून बना सकता है और सदन में किसी मुद्दे पर अच्छी बहस मज़बूत विपक्ष के बिना संभव नहीं है.
भारतीय लोकतंत्र इस बात का गवाह रहा है कि जब भी अटल बिहारी वाजपेयी, भैरो सिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता संसद में बोलते थे, सत्ता पक्ष उनकी बातों को संजीदगी से सुनता था.
न सिर्फ सुनना, नीतियों और योजनाओं को विपक्ष की बहस से धार दिया जाता था और उसे जनोत्थान के लिए बेहतर समझा जाता है.
एनडीए सरकार भी मज़बूत विपक्ष के महत्व को समझती है. भाजपा के वरिष्ठ नेता तरुण विजय क्षेत्रीय अख़बार प्रभात ख़बर में प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं, "विपक्ष धारदार, असरदार और ईमानदार हो तो सरकार उसके डर से कांपती है, देश का भला होता है, सरकारी नेताओं का अंहकार, उनकी निरंकुश और मनमानी नियंत्रित रहती है."
Tuesday, February 5, 2019
मोदी से आर-पार की जंग के लिए ममता कितनी तैयार? - नज़रिया
इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ धरने पर बैठने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक क़द में बढ़ोतरी हुई है.
ममता बनर्जी लोकसभा चुनावों के लिए बनाई अपनी रणनीति के तहत धीरे-धीरे क़दम बढ़ा रही हैं ताकि वह नरेंद्र मोदी को पटखनी देकर प्रधानमंत्री पद पर बैठ सकें.
शारदा चिटफ़ंड घोटाले के मामले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ के ख़िलाफ़ धरने पर बैठना भी राष्ट्रीय राजनीति में आने की ओर उठाया गया एक क़दम है.
सीबीआई ने राजीव कुमार पर शारदा चिटफ़ंड मामले में सुबूतों को नष्ट करने का आरोप लगाया है.
इस मामले में ममता बनर्जी इसप्लानाडे इलाक़े के मेट्रो चैनल पर धरने पर बैठी. यह वही जगह है जहां पर साल 2006 में उन्होंने सिंगूर में टाटा मोटर्स की फैक्ट्री के लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण के ख़िलाफ़ धरना दिया था
हालांकि, इस समय विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिए कई उम्मीदवार हैं. लेकिन अभी तक विपक्षी दलों में किसी एक चेहरे के लिए आम सहमति नहीं बनी है.
लेकिन ममता बनर्जी ने अपनी जगह राहुल गांधी और शरद पवार जैसे उम्मीदवारों के साथ पहली पंक्ति में बना ली है.
अगर ममता बनर्जी अपने इस वर्तमान संघर्ष में मोदी को हरा देती हैं तो वह निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी हासिल कर लेंगी.
विपक्षी दलों का समर्थन
ममता बनर्जी ने अपनी इस लड़ाई में विपक्षी दलों का समर्थन हासिल किया है.
लेकिन ये ममता बनर्जी की एक ख़ास छवि की वजह से हुआ है जो उन्होंने बीते कई सालों में बनाई है.
इसके साथ ही क्षेत्रीय नेताओं में एक तरह का डर है कि अगर ममता के साथ कुछ होता है तो भविष्य में वही उनके साथ भी हो सकता है.
इस बात की भी संभावना है कि क्षेत्रीय दल राहुल गांधी की अपेक्षा ममता बनर्जी के साथ ज़्यादा सहज हैं.
इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री देवेगैड़ा से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य क्षेत्रीय नेता जैसे चंद्रबाबू नायडु लोकतंत्र बचाने की अपील पर उनके समर्थन में आकर खड़े हो जाते हैं.
ममता बनर्जी इसी समय बेहद चालाकी से इस राजनीतिक अवसर का फ़ायदा उठाकर ख़ुद को लाइमलाइट में ले आती हैं.
ये देखना अपने आप में रोचक है कि रविवार की रात धरने का ऐलान करने के बाद कितनी तेज़ी से उनकी पार्टी उनके समर्थन में खड़ी हो गई.
उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कुछ ही मिनटों में धरनास्थल पर पहुंच गए और आम आदमी पार्टी से लेकर राहुल गांधी ने तेज़ी से उनका समर्थन करने की घोषणा करते हुए उनके साथ बातचीत कर ली.
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पहली बात ये ही हुई कि ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक माद्दा दिखाते हुए 19 जनवरी को लगभग सभी विपक्षी दलों को कोलकाता में अपनी रैली में शामिल कर लिया.
कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में 23 पार्टियों के नेताओं ने जब एक साथ हाथ उठाए तो बीजेपी के लिए ये काफ़ी असहज करने वाला संकेत था.
इस रैली का संदेश ये था कि ममता बनर्जी अपने मतदाताओं की नज़र में खुद को एक बड़ी राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं.
हालांकि, इसका व्यापक संदेश पूरे देश के लिए था कि विपक्षी नेता उनके नेतृत्व तले खड़े होने के लिए तैयार हैं.
ऐसे में उम्मीद ये है कि जब विपक्षी नेता अपना नेता चुनने के लिए प्रक्रिया शुरू करें तो दीदी किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं चाहती हैं.
साल 2014 से ममता बनर्जी मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोले हुए हैं. इसमें गोहत्या से लेकर गोमांस पर प्रतिबंध, जीएसटी, नोटबंदी और कई अन्य विवादास्पद मुद्दे शामिल हैं.
ममता ने अपनी छवि एक ऐसे विद्रोही नेता के रूप में बनाई है जो कि देश के लिए संघर्ष कर सकती हैं.
ऐसे में एक ऐसी महिला की छवि, जो कि शक्ति के प्रति आसक्त नहीं है, इन सबने ममता बनर्जी की काफ़ी मदद की है.
इसके साथ ही उन्होंने युवाओं को लुभाने में सफलता हासिल की है, और युवा शक्ति ही राजनीति में ममता बनर्जी की मदद करती है.
ममता की रणनीति समझने के लिए उनके चार दशक लंबे राजनीतिक करियर के पीछे उनकी सोच को समझना ज़रूरी है.
सात बार की लोकसभा सदस्य ममता बनर्जी दिल्ली की राजनीति के लिहाज़ से नौसिखिया नहीं हैं.
वह अब तक तीन बार केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं और उनके पास राष्ट्रीय अनुभव भी है.
80 के दशक की शुरुआत में ही ममता बनर्जी ने समझ लिया था कि पश्चिम बंगाल में उनका मुख्य विरोधी दल सीपीआई-एम है. और, उन्होंने तब से ही साम्यवाद के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोला हुआ है.
नंदीग्राम से लेकर सिंगूर धरना करते हुए उनका मुख्य उद्देश्य कॉमरेड्स को सत्ता से बाहर करना था.
वह संघर्ष की राजनीति करने वाली नेता हैं और सड़क की राजनीति में माहिर मानी जाती हैं.
इसी एकाग्रता के चलते ममता बनर्जी ने साल 2011 में 33 सालों से सत्ता पर विराजमान सीपीआई-एम को सत्ता से बाहर कर दिया.
ममता बनर्जी लोकसभा चुनावों के लिए बनाई अपनी रणनीति के तहत धीरे-धीरे क़दम बढ़ा रही हैं ताकि वह नरेंद्र मोदी को पटखनी देकर प्रधानमंत्री पद पर बैठ सकें.
शारदा चिटफ़ंड घोटाले के मामले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ के ख़िलाफ़ धरने पर बैठना भी राष्ट्रीय राजनीति में आने की ओर उठाया गया एक क़दम है.
सीबीआई ने राजीव कुमार पर शारदा चिटफ़ंड मामले में सुबूतों को नष्ट करने का आरोप लगाया है.
इस मामले में ममता बनर्जी इसप्लानाडे इलाक़े के मेट्रो चैनल पर धरने पर बैठी. यह वही जगह है जहां पर साल 2006 में उन्होंने सिंगूर में टाटा मोटर्स की फैक्ट्री के लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण के ख़िलाफ़ धरना दिया था
हालांकि, इस समय विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिए कई उम्मीदवार हैं. लेकिन अभी तक विपक्षी दलों में किसी एक चेहरे के लिए आम सहमति नहीं बनी है.
लेकिन ममता बनर्जी ने अपनी जगह राहुल गांधी और शरद पवार जैसे उम्मीदवारों के साथ पहली पंक्ति में बना ली है.
अगर ममता बनर्जी अपने इस वर्तमान संघर्ष में मोदी को हरा देती हैं तो वह निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी हासिल कर लेंगी.
विपक्षी दलों का समर्थन
ममता बनर्जी ने अपनी इस लड़ाई में विपक्षी दलों का समर्थन हासिल किया है.
लेकिन ये ममता बनर्जी की एक ख़ास छवि की वजह से हुआ है जो उन्होंने बीते कई सालों में बनाई है.
इसके साथ ही क्षेत्रीय नेताओं में एक तरह का डर है कि अगर ममता के साथ कुछ होता है तो भविष्य में वही उनके साथ भी हो सकता है.
इस बात की भी संभावना है कि क्षेत्रीय दल राहुल गांधी की अपेक्षा ममता बनर्जी के साथ ज़्यादा सहज हैं.
इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री देवेगैड़ा से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य क्षेत्रीय नेता जैसे चंद्रबाबू नायडु लोकतंत्र बचाने की अपील पर उनके समर्थन में आकर खड़े हो जाते हैं.
ममता बनर्जी इसी समय बेहद चालाकी से इस राजनीतिक अवसर का फ़ायदा उठाकर ख़ुद को लाइमलाइट में ले आती हैं.
ये देखना अपने आप में रोचक है कि रविवार की रात धरने का ऐलान करने के बाद कितनी तेज़ी से उनकी पार्टी उनके समर्थन में खड़ी हो गई.
उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कुछ ही मिनटों में धरनास्थल पर पहुंच गए और आम आदमी पार्टी से लेकर राहुल गांधी ने तेज़ी से उनका समर्थन करने की घोषणा करते हुए उनके साथ बातचीत कर ली.
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पहली बात ये ही हुई कि ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक माद्दा दिखाते हुए 19 जनवरी को लगभग सभी विपक्षी दलों को कोलकाता में अपनी रैली में शामिल कर लिया.
कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में 23 पार्टियों के नेताओं ने जब एक साथ हाथ उठाए तो बीजेपी के लिए ये काफ़ी असहज करने वाला संकेत था.
इस रैली का संदेश ये था कि ममता बनर्जी अपने मतदाताओं की नज़र में खुद को एक बड़ी राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं.
हालांकि, इसका व्यापक संदेश पूरे देश के लिए था कि विपक्षी नेता उनके नेतृत्व तले खड़े होने के लिए तैयार हैं.
ऐसे में उम्मीद ये है कि जब विपक्षी नेता अपना नेता चुनने के लिए प्रक्रिया शुरू करें तो दीदी किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं चाहती हैं.
साल 2014 से ममता बनर्जी मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोले हुए हैं. इसमें गोहत्या से लेकर गोमांस पर प्रतिबंध, जीएसटी, नोटबंदी और कई अन्य विवादास्पद मुद्दे शामिल हैं.
ममता ने अपनी छवि एक ऐसे विद्रोही नेता के रूप में बनाई है जो कि देश के लिए संघर्ष कर सकती हैं.
ऐसे में एक ऐसी महिला की छवि, जो कि शक्ति के प्रति आसक्त नहीं है, इन सबने ममता बनर्जी की काफ़ी मदद की है.
इसके साथ ही उन्होंने युवाओं को लुभाने में सफलता हासिल की है, और युवा शक्ति ही राजनीति में ममता बनर्जी की मदद करती है.
ममता की रणनीति समझने के लिए उनके चार दशक लंबे राजनीतिक करियर के पीछे उनकी सोच को समझना ज़रूरी है.
सात बार की लोकसभा सदस्य ममता बनर्जी दिल्ली की राजनीति के लिहाज़ से नौसिखिया नहीं हैं.
वह अब तक तीन बार केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं और उनके पास राष्ट्रीय अनुभव भी है.
80 के दशक की शुरुआत में ही ममता बनर्जी ने समझ लिया था कि पश्चिम बंगाल में उनका मुख्य विरोधी दल सीपीआई-एम है. और, उन्होंने तब से ही साम्यवाद के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोला हुआ है.
नंदीग्राम से लेकर सिंगूर धरना करते हुए उनका मुख्य उद्देश्य कॉमरेड्स को सत्ता से बाहर करना था.
वह संघर्ष की राजनीति करने वाली नेता हैं और सड़क की राजनीति में माहिर मानी जाती हैं.
इसी एकाग्रता के चलते ममता बनर्जी ने साल 2011 में 33 सालों से सत्ता पर विराजमान सीपीआई-एम को सत्ता से बाहर कर दिया.
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